Tuesday, March 6, 2012

KITNE AJEEB RISHTE HAIN YAHAN PE..............................

कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ पे ........................................

हाल ही में हुए शहला मसूद हत्याकांड में गिरफ्तार मुख्य आरोपी जाहिदा ने रिश्तों को तार-तार करने वाले जो खुलासे किये हैं उसने रिश्तों की अहमियत और गरिमा पर एक सवाल उठा दिया है. अपनी मह्त्वाकान्शा और इर्ष्या की भावना ने उसके मन में इतना ज़हर घोल दिया की अपनी खास सहेली को उसने मौत के घाट उतार दिया. बिना यह सोचे समझे की इसके परिणाम क्या होंगे परिवार का क्या होगा. आज रिश्तों की परिभाषा कितनी बदल चुकी है समाज में. आखिर क्यों पनप रही है इस प्रकार की विकृतियाँ ? क्यों इन्सान इतना स्वार्थी और असंवेदनशील होता जा रहा है ? कौन ज़िम्मेदार है इसके पीछे ?  

जब हम समाज में इंसानी सभ्यता की बात करते हैं तो वहां रिश्तों का एक महत्वपूर्ण स्थान है.रिश्ते समाज की ही देन हैं चाहे वो माँ - बाप, पति - पत्नी, भाई - बहन, दोस्त इत्यादि जिन्हें सामाजिक रूप से अपनाया भी जाता है और वैध भी हैं. लेकिन आज के दौर में इन सब रिश्तों के परे एक रिश्ता जो काफी तेज़ी से पनप रहा है वो है " अवैध सम्बन्ध  " जिसे समाज द्वारा न पहले स्वीकृति थी न आज है. आज भी इन रिश्तों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता. अगर हम सामाजिक इतिहास पर नज़र डालें तो ये रिश्ते सदियों से पनप रहे हैं. राजा - महाराजाओं के काल में ये रिश्ते उच्च वर्ग तक सिमित थे लेकिन समय की बदलती हुई करवट ने निम्न वर्ग को भी अपनी चपेट में लिया. प्रारंभिक दौर में सिर्फ मध्यम वर्ग ही ऐसा था जो इससे अछूता था लेकिन हावी होती पाश्चात्य संस्कृति और टेली-विज़न के माध्यम से इसने  मध्यम वर्ग में भी अपने पैर फैला लिए. पहले इन संबंधों को लेकर एक सामाजिक भय था लेकिन वासना, स्वार्थ और व्यावसायिक मह्त्वाकान्शा ने भय को दरकिनार कर इस रिश्ते को बढ़ावा दिया, यह कोई पहली घटना नहीं है ऐसी कई घटनाएँ हैं जिसमे अवैध संबंधो की वज़ह से जघन्य हत्या कांड हुए हैं. एक घटना कई परिवारों को बर्बाद कर देती है जिसका ज़ख्म पीढ़ी दर पीढ़ी ताज़ा रहता है.

टेली-विज़न और फिल्मो में अवैध संबंधो को जितनी सहजता से दिखाया जाता है उतनी ही आसानी से इंसान भी उसे अपनी जीवन शैली में ढालने की कोशिश करता है. इन संबंधो का न तो कोई चेहरा होता है न ही कोई पहचान बस ये पनपते रहते हैं और एक दिन इन्सान को ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देते हैं जहाँ न तो ज़मीर की आवाज़ सुनाई देती है न विवेक काम करता है और नतीजे ................. हम देख ही रहे हैं. 
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से अगर देखें तो आज मनुष्य को आवश्यकता है आत्म चिंतन की वासना और स्वार्थ से बाहर आने की तभी हम रिश्तों को उनका वास्तविक और वैध स्वरुप दे पाएंगे अन्यथा यही कहते और सुनते रहेंगे ...................कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ पे..




Sunday, February 26, 2012

KAHIN APRAADH HI SHRISHTI KE ANT KA AGAAZ TO NAHI...

कहीं अपराध ही सृष्टि के अंत का आगाज़ तो नहीं ............

यूँ तो सारी दुनिया में अपराध हो रहे हैं, पर अगर हमारे देश या प्रदेश पर गौर करें तो बढ़ते हुए अपराधों की संख्या के अलावा आपको उसमे विविधता भी देखने को मिलेगी, खासतौर पर अकारण अपराधों की श्रेणी में हमारा प्रदेश सबसे आगे है. हाल ही में रीवा में एक बस कंडक्टर द्वारा महज़ ५ रुपये के विवाद पर एक छात्र को बस से धक्का दे दिया गया और डिवाईडर से टकराकर उसकी मौत हो गई. कभी नाइट्रावेट के नशे में मासूम लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता है तो कभी मामूली से विवाद में हत्या हो जाती है.हमारे यहाँ अपराध मौसम की तरह बदलते हैं कभी राजनैतिक अपराधों का दौर होता है तो कभी घोटालों का या रिश्वतखोरों का कभी भू माफियाओं का दौर रहता है तो कभी आर्थिक अपराधों का, हाल ही में दौर चला था बलात्कारों का जिसने सारे प्रदेश को शर्मसार कर दिया और हिंदुस्तान का दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश का दिल सारी दुनिया को दिखा दिया. जिन छेत्रों में ये वारदात हुई अगर हम उन छेत्रों के नामो का संधि विच्छेद करें तो समझ मे आएगा की इंसानियत, संस्कृति और सभ्यता किस तरह शर्मसार हुई सबसे पहला कांड हुआ बेटमा में इस कसबे के नाम में बेटा और माँ दोनों शब्द शामिल हैं जहाँ कई बेटों ने मिल कर माँ के नाम को कलंकित किया. देपालपुर गाँव इस नाम से यह आशय लगाया जा सकता है की इसके पालक देवता हैं यहाँ पर एक मूक बधिर के साथ बलात्कार हुआ और जनता मूक बनी रही और प्रशासन बधिर. देवास नाका जिसके नाम में ही देवताओं का वास है वहां एक महिला के साथ पुनः सामूहिक दुष्कृत्य किया गया. लूट, डकैती, चोरी ये अपराध आजकल आम अपराधों की श्रेणी में आते हैं. और हत्या और बलात्कार जैसे संगीन अपराध धीरे - धीरे आम होते जा रहे हैं. कई अपराधियों को सजा हो जाती है कई रिहा हो जाते है और कई खुले आम घूम रहे हैं, क्या सिर्फ सजा देने से अपराधों का अंत संभव है ? यह एक अत्यंत ही गंभीर एवं सोचनीय विषय है जिसका जवाब शायद कानून विशेषज्ञों के पास भी नहीं मिलेगा.
आज हमारे देश ने आर्थिक, व्यावसायिक और तकनिकी उन्नति तो काफी रफ़्तार से कर ली है पर उतनी ही रफ़्तार के साथ हमारा सांस्कृतिक और सामाजिक पतन भी हुआ है. जब भी अपराध होते हैं तो इसका कलंक संस्कृति, समाज और सभ्यता पर लगता है. इसका कारण कुछ हद तक अशिक्षा को माना जाये तो सही पर शिक्षित वर्ग भी अपराधों में शामिल है उसका ज़िम्मेदार कौन है. अपराध समाज की ही देन है और इस पर रोक भी समाज द्वारा ही लगाई जा सकती है कानून तो एक नियंत्रण का ज़रिया है.
हम रोज़ सुबह की शुरुआत अखबार से करते हैं, एक सकारात्मक सोच लेकर लेकिन रोज़ अखबारों में आपराधिक ख़बरें पढ़ कर मन विचलित हो जाता है. कई बार मन में यह ख्याल भी आता है की एक दिन तो ऐसा अखबार प्रकाशित होगा जिसमे एक भी अप्रिय घटना का समाचार न हो शायद वो हमारी ज़िन्दगी का पहला और सबसे अविस्मर्णीय सकारात्मक दिन होगा. अन्यथा कहीं ऐसा न हो की अंतर्राष्ट्रीय, खेल, व्यवसाय जैसे पृष्ठों की तरह एक दिन अपराध का भी एक अलग से पृष्ठ अखबार में देखने को मिले. कई भविष्य वक्ताओं ने कहा है की २०१२ में सृष्टि का अंत है यह होगा या नहीं यह तो कोई नहीं जानता लेकिन अपराधों ने जो इंसानियत का अंत किया है क्या यही सृष्टि के अंत का आगाज़ तो नहीं................................... ज़रा सोचिये ...


JAIDEEP R.BHAGWAT

19.. SUNCITY 

INDORE
9755591736........jrbhagwat@gmail.com

Monday, December 5, 2011

KOLAVERI ..........D

 प्रसार तंत्र का दबाव 

आज की युवा पीढ़ी जिस स्तर का संगीत पसंद करती है उस वातावरण में "कोलावेरी डी" एक आविष्कार की तरह है जिसकी धुन औसत है और बोल अर्थहीन हैं लेकिन फिर भी आज हर व्यक्ति के बीच यह चर्चा का विषय बना हुआ है, खासतौर पर युवा वर्ग जो अपना अधिकतर समय इन्टरनेट पर सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर गुज़रता है | इस गीत को सर्वप्रथम "यू ट्यूब" पर लोड किया गया था जिसके द्वारा सारी दुनिया में इसका प्रचार हुआ और लाखों करोड़ों लोगों ने इसे सुना और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की जब करोड़ों प्रतिक्रियाएं इन्टरनेट पर आने लगी तो अन्य लाखों लोगों ने भी इसे उत्सुकतावश देखा और सुना और प्रसार तंत्र के माध्यम टेलिविज़न और रेडियो चेनल्स पर भी इसे प्रसारित किया जाने लगा और करोड़ों की भीड़ और प्रसार तंत्र ने ऐसा दबाव बनाया की इस गीत ने दुनिया में धूम मचा दी और लोग इसे सुनने के लिए बाध्य हो गए. इसका मुख्य श्रेय प्रसार तंत्र को ही जाता है क्योंकि आने वाले समय में यह गीत अन्य किसी अर्थहीन गीत के प्रचार और प्रसार के बोझ तले दब जायेगा तब हम "व्हाय दिस कोलावेरी डी" की जगह बोलेंगे " वेयर इज कोलावेरी डी ".

Tuesday, October 18, 2011

SHAYAD BACHPAN FIR LAUT AAYE.....

शायद बचपन फिर लौट आए..................................................

 आज की शिक्षा प्रणाली में किताबों और बस्तों के बोझ तले बचपन कहाँ दब गया पता ही नहीं चला. दशहरे और दिवाली की २५ दिनों की छुट्टियाँ आज की पीढ़ी के लिए नाना नानी के किस्से कहानियों जैसी हो गई है और कुछ सालों बाद ढूँढने पर अवशेष भी नहीं मिलेंगे. दशहरा और दिवाली का त्यौहार हमारी सांस्कृतिक परंपरा है और दशहरे से दिवाली तक का समय एक उत्सव की तरह सम्पूर्ण हर्षौल्लाह्स के साथ मनाया जाता है चारों और रौनक ही रौनक दिखाई देती है जिसका खासतौर पर बच्चों में अत्यधिक उत्साह होता है. ग्रामीण अंचलों में भी ये छुट्टियाँ अत्यधिक महत्व रखती थी क्योंकि यह समय होता है रबी की फसल कटने का. परिवार की सभी बड़े बुज़ुर्ग और महिलाएं खेतों में फसल काटते हैं और घर के बड़े बच्चे छोटे बच्चों को संभाल लेते थे. लेकिन आज कल छुट्टियाँ मुट्ठी में रखी रेत की तरह फिसल जाती हैं और त्यौहार को छुकर ऐसे गुज़र जाती है जैसी कोई तेज़ हवा का झोंका.
पहले जब बच्चे दिवाली की छुट्टियों के बाद  स्कूल जाते थे तो कई दिन सिर्फ चर्चाओं में बीतते थे हर बच्चा उत्साह के साथ अपना अनुभव सुनाता था त्यौहार का असर धीरे धीरे कम होता था और ज़िन्दगी वापस अपनी पटरी पर आ जाती थी. लेकिन अब बच्चा मायूस सा चेहरा लेकर लौटता है और चर्चा में होता है होमवर्क, असायिन्मेंट्स और प्रोजेक्ट्स. होमवर्क का बोझ इतना अधिक होता है की बच्चा त्यौहार भूलकर होमवर्क में लग जाता है.
जब सरकार द्वारा गर्मी की छुट्टियों में कटौती कर ही दी गई है तो दिवाली की छुट्टियों को पुनः २५ दिन करना जायज़ है. शायद इसी बहाने इस पीढ़ी का बचपन फिर लौट आए और बच्चे त्योहारों का आनंद ले सके... 

Monday, August 1, 2011

VASTVIKTA KE NAAM PAR ASHLEELTA

वास्तविकता के नाम पर अशलीलता............................................................................................................

अगर हम हिंदी सिनेमा के पिछले एक दशक पर गौर करे तो वास्तविकता और यथार्थवादी फिल्मो का निर्माण अधिक हुआ है और निर्माता एवं निर्देशकों ने वास्तविकता के नाम पर हिंसा और अशलीलता को खूब परोसा है. अभी हम इससे उबर भी नहीं पाए थे के " डेली बेली " ने इस पर गालियों का तड़का और लगा दिया. हमारे समाज का कोई भी वर्ग प्रचलित गालियों से अछूता नहीं है, हमे रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में इन गालियों का सामना करना ही पड़ता है. 
इसी दौर में " सिंघम " जैसी फिल्म भी आई जिसमे बिना किसी हिंसा एवं क्रूरता के एक्शन दृश्यों का मनोरंजक ढंग से प्रस्तुतिकरण किया गया, नायिका को भी सौम्यता से प्रस्तुत किया गया और संवाद भी अश्लील और फूहड़ नहीं थे. साथ ही साथ पुलिस की छवि और कार्यप्रणाली पर भी करारा प्रहार किया गया और अंत में यह सन्देश भी था की सिस्टम में रहते हुए भी बुराइयों का अंत  किया जा सकता है. फिल्मो का उद्देश्य होता है मनोरंजन के साथ समाज को एक सकारात्मक सन्देश भी दे लेकिन " डेली बेली " देखकर ऐसा लगता है की इस फिल्म ने सिर्फ उन लोगों के शब्द कोष में वृद्धि की है जिनके वाक्य की शुरुआत और अंत ही गालियों से होती है. हो सकता है की " डेली बेली " भविष्य में निर्मित होने वाली फिल्मो का आधारस्तंभ बन जाये जिनमे गालियों का प्रयोग आम हो जायेगा.

Saturday, July 30, 2011

SADI KA MAHA GAYAK ( KISHORE KUMAR)

सदी का महा गायक ................... किशोर कुमार...
किसी ने सही कहा था, किशोर कुमार जैसे गायक सदियों में एक बार ही जन्म लेते हैं. आज किशोर दा हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके नगमे दुनिया में आज भी उसी शिद्दत के साथ सुने जाते हैं. बिना किसी संगीत की विधिवत शिक्षा के उन्होंने गायकी को अपनाया और अपनी अनोखी आवाज़ से ५० और ६० के दशक के हताश युवा वर्ग में एक जोश और जूनून भर दिया. इस अश्व्घोशी आवाज़ के मालिक ने पूरे हिन्दुस्तान को अपनी आवाज़ का दीवाना बना दिया. जितने अच्छे वे अदाकार थे उतने ही महान वे गायक थे. उनकी यूडलिंग और गीत को सहजता से गाने की कला आज भी लोगों के दिलों को छूती है. शास्त्रीय संगीत हालाँकि उनकी शैली में शामिल नहीं था फिर भी शास्त्रीय धुनों पर आधारित गीतों को बखूबी निभाया जैसे महबूबा फिल्म का गीत " मेरे नैना सवानभादों "  ( राग शिवरंजनी ) आज भी लोगों के ज़हन में ताज़ा है, उनके रोमांटिक गीतों ने लोगों का दिल बहलाया, मस्ती भरे गीतों ने लोगों को खूब हंसाया और दर्द भरे गीतों ने लोगो रुलाया.
सन १९६९ की फिल्म "आराधना" का गीत " मेरे सपनो की रानी " किशोर दा की ज़िन्दगी का टर्निंग पॉइंट था यह समय था उस दशक  के उभरते संगीतकार आर. डी बर्मन का इन दोनों कलाकारों की जोड़ी ने ७० से लेकर ८० के दशक तक अनगिनत लोकप्रिय गीत दिए इन गीतों को हर उम्र के लोगों द्वारा पसंद किया गया. किशोर दा जब भी किसी गीत को गाते थे तो गाने से पहले उस गीत की हर बारीकी को समझते थे कि यह किस अभिनेता पर फिल्माया जा रहा है गीत की सिचुएशन क्या है, यह जान लेने के बाद वे अपनी आवाज़ में वे भाव पैदा करते थे जिससे कि गीत वास्तविक स्तिथि के अनुसार लगे, अभिनेता कि आवाज़ में अपनी आवाज़ को ढालने कि कला सिर्फ किशोर दा में ही थी. "हाफ टिकिट" फिल्म का गीत "आ के सीधी लगी जैसे दिल पे कटरिया" किशोर दा और प्राण साहब पर फिल्माया गया है इस गीत में किशोर दा ने खुद पर फिल्माया हुआ टुकड़ा लड़की कि आवाज़ में गाया है और प्राण साहब पर फिल्माया हुआ लड़के कि आवाज़ में. यह गीत सुनने के बाद प्राण साहब खुद बोले कि मुझे ऐसा लगा जैसे कि यह मेरी ही आवाज़ है. देव आनंद, संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, ऋषि कपूर ऐसे कई अभिनेता हैं जिनकी आवाज़ को किशोर दा ने बड़ी ख़ूबसूरती से निभाया. 
किशोर दा में अभिनय और गायकी के अलावा संगीत निर्देशन, गीतकार, निर्माता एवं निर्देशक की भी प्रतिभा थी. उनकी फिल्मे आज भी फिल्म इंडस्ट्री के इतिहास में अविस्मर्णीय है. अपने गाए लगभग २५०० से अधिक गीतों में सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों का रिकॉर्ड सिर्फ किशोर दा का ही है. अपने जीवन के संगीत सफ़र में किशोर दा ने सभी मूड के गीत गाए जिसमे ग़ज़लें भी शामिल हैं जैसे फिल्म "दर्द का रिश्ता" का गीत " यूँ नींद से वो जाने चमन जाग उठी है " ने यह साबित कर दिया था की वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे.
किशोर कुमार जैसी शकसियत को भुला पाना किसी भी सदी में संभव नहीं होगा, जो गीतों का खजाना उन्होंने इस दुनिया को दिया है वो कभी ख़त्म नहीं हो सकता. उनका असली नाम 'आभास कुमार गांगुली' था और उनके गीतों द्वारा उनके सभी चाहने वालों को उनका "आभास" हमेशा होता रहेगा. अपनी मृत्यु के पहले उन्होंने एक बार लीना जी को कहा था " देखना एक दिन लोग मुझे पुकारते रहेंगा और मै लौट कर नहीं आऊंगा ". लेकिन महागायक मरा नहीं करते उनकी आवाज़ सदियों तक लोगों के दिलों में सफ़र करती रहती है और कहती रहती है " राहों पे रहते हैं यादों में बसर करते हैं .....खुश रहो अहले वतन हम तो सफ़र करते हैं ".
 

Friday, May 20, 2011

POST 2

भाषा और हमारा व्यक्तित्व.... ( LANGUAGE AND OUR PERSONALITY )
भाषा क्या केवल "भाष" धातु से बना एक शब्द है या इससे अधिक कुछ और ?
वर्तमान परिपेक्ष्य में यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ज्वलंत विषय है | भाषा को केवल विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम भर समझा जाता है जबकि यह वह ज़रिया है जिसके द्वारा हम समूचे विश्व से रूबरू होते हैं |  तब क्या इस ज़रिये का पूर्ण रूप से शुद्ध और प्रभावी होना महत्वपूर्ण नहीं है ? ऐसा क्यों होता है यद्यपि बोलने का सामर्थ्य इश्वर प्रद्दत है और इसके लिए हमे कुछ विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता तथापि हम में से कुछ लोग ही ऐसे हैं जब वे बोलना प्रारंभ करते हैं तो शेष सभी उन्हें सुनने के लिए विवश हो जाते हैं | 
वस्तुतः प्रस्तुतीकरण ( PRESENTATION ) के इस दौर में भाषा हमारे व्यक्तित्व का आईना हो चली है बाह्य रूप से कोई व्यक्ति कितना ही आकर्षक हो परन्तु यह प्रभाव अधिक समय तक नहीं रह सकता यदि उसका भाषा पर विशेष अधिकार न हो | वहीँ सामान्य व्यक्तित्व  के साथ कोई भाषा का जादूगर गहरा प्रभाव छोड़ सकता है |
यहाँ उल्लेखनीय है कि आज की युवा पीढ़ी जब उच्च शिक्षा के बाद जीवन-चर्या ( CAREER ) के निर्णायक  मोड़ पर होती है तब उसे सिरे से नकार  दिया जाता है और उसे व्यक्तित्व विकास ( PERSONALITY DEVELOPMENT )  जैसे पाठ्यक्रमो के समक्ष शरणागत होना पड़ता है | मूल रूप से यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की दयनीय स्थिति का घोतक है जो बड़े पैमाने पर अन्धाधून्द गति से शिक्षा का ऐसा महल बनाने  में व्यस्त है, जिसकी भाषा रुपी नीव ही अत्यंत कमज़ोर है |
गौरतलब है जहाँ विदेशों में प्राथमिक कक्षाओं में भी बच्चों को शब्दकोष रखना अनिवार्य है, वहीँ हमारे विश्वविद्यालयीन छात्र भी शब्दकोष के महत्व से अनभिज्ञ हैं |
वैश्वीकरण ( GLOBALIZATION ) के इस युग में आवश्यक है कि हम न केवल प्रादेशिक भाषाओँ की राजनितिक लड़ाइयों से उबरें वरन हिंदी- अंग्रेजी के बचकाना विवादों से बचते हुए वृहद् स्तर पर परिपक्व मानसिकता से इस विषय पर निर्णायक विचार करें कि विश्व की कोई भी भाषा कम या अधिक महत्वपूर्ण नहीं है | महत्वपूर्ण है किसी भी भाषा का शुद्ध और सही प्रयोग और इस दिशा में किये गए सार्थक प्रयास |