Monday, December 5, 2011

KOLAVERI ..........D

 प्रसार तंत्र का दबाव 

आज की युवा पीढ़ी जिस स्तर का संगीत पसंद करती है उस वातावरण में "कोलावेरी डी" एक आविष्कार की तरह है जिसकी धुन औसत है और बोल अर्थहीन हैं लेकिन फिर भी आज हर व्यक्ति के बीच यह चर्चा का विषय बना हुआ है, खासतौर पर युवा वर्ग जो अपना अधिकतर समय इन्टरनेट पर सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर गुज़रता है | इस गीत को सर्वप्रथम "यू ट्यूब" पर लोड किया गया था जिसके द्वारा सारी दुनिया में इसका प्रचार हुआ और लाखों करोड़ों लोगों ने इसे सुना और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की जब करोड़ों प्रतिक्रियाएं इन्टरनेट पर आने लगी तो अन्य लाखों लोगों ने भी इसे उत्सुकतावश देखा और सुना और प्रसार तंत्र के माध्यम टेलिविज़न और रेडियो चेनल्स पर भी इसे प्रसारित किया जाने लगा और करोड़ों की भीड़ और प्रसार तंत्र ने ऐसा दबाव बनाया की इस गीत ने दुनिया में धूम मचा दी और लोग इसे सुनने के लिए बाध्य हो गए. इसका मुख्य श्रेय प्रसार तंत्र को ही जाता है क्योंकि आने वाले समय में यह गीत अन्य किसी अर्थहीन गीत के प्रचार और प्रसार के बोझ तले दब जायेगा तब हम "व्हाय दिस कोलावेरी डी" की जगह बोलेंगे " वेयर इज कोलावेरी डी ".

Tuesday, October 18, 2011

SHAYAD BACHPAN FIR LAUT AAYE.....

शायद बचपन फिर लौट आए..................................................

 आज की शिक्षा प्रणाली में किताबों और बस्तों के बोझ तले बचपन कहाँ दब गया पता ही नहीं चला. दशहरे और दिवाली की २५ दिनों की छुट्टियाँ आज की पीढ़ी के लिए नाना नानी के किस्से कहानियों जैसी हो गई है और कुछ सालों बाद ढूँढने पर अवशेष भी नहीं मिलेंगे. दशहरा और दिवाली का त्यौहार हमारी सांस्कृतिक परंपरा है और दशहरे से दिवाली तक का समय एक उत्सव की तरह सम्पूर्ण हर्षौल्लाह्स के साथ मनाया जाता है चारों और रौनक ही रौनक दिखाई देती है जिसका खासतौर पर बच्चों में अत्यधिक उत्साह होता है. ग्रामीण अंचलों में भी ये छुट्टियाँ अत्यधिक महत्व रखती थी क्योंकि यह समय होता है रबी की फसल कटने का. परिवार की सभी बड़े बुज़ुर्ग और महिलाएं खेतों में फसल काटते हैं और घर के बड़े बच्चे छोटे बच्चों को संभाल लेते थे. लेकिन आज कल छुट्टियाँ मुट्ठी में रखी रेत की तरह फिसल जाती हैं और त्यौहार को छुकर ऐसे गुज़र जाती है जैसी कोई तेज़ हवा का झोंका.
पहले जब बच्चे दिवाली की छुट्टियों के बाद  स्कूल जाते थे तो कई दिन सिर्फ चर्चाओं में बीतते थे हर बच्चा उत्साह के साथ अपना अनुभव सुनाता था त्यौहार का असर धीरे धीरे कम होता था और ज़िन्दगी वापस अपनी पटरी पर आ जाती थी. लेकिन अब बच्चा मायूस सा चेहरा लेकर लौटता है और चर्चा में होता है होमवर्क, असायिन्मेंट्स और प्रोजेक्ट्स. होमवर्क का बोझ इतना अधिक होता है की बच्चा त्यौहार भूलकर होमवर्क में लग जाता है.
जब सरकार द्वारा गर्मी की छुट्टियों में कटौती कर ही दी गई है तो दिवाली की छुट्टियों को पुनः २५ दिन करना जायज़ है. शायद इसी बहाने इस पीढ़ी का बचपन फिर लौट आए और बच्चे त्योहारों का आनंद ले सके... 

Monday, August 1, 2011

VASTVIKTA KE NAAM PAR ASHLEELTA

वास्तविकता के नाम पर अशलीलता............................................................................................................

अगर हम हिंदी सिनेमा के पिछले एक दशक पर गौर करे तो वास्तविकता और यथार्थवादी फिल्मो का निर्माण अधिक हुआ है और निर्माता एवं निर्देशकों ने वास्तविकता के नाम पर हिंसा और अशलीलता को खूब परोसा है. अभी हम इससे उबर भी नहीं पाए थे के " डेली बेली " ने इस पर गालियों का तड़का और लगा दिया. हमारे समाज का कोई भी वर्ग प्रचलित गालियों से अछूता नहीं है, हमे रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में इन गालियों का सामना करना ही पड़ता है. 
इसी दौर में " सिंघम " जैसी फिल्म भी आई जिसमे बिना किसी हिंसा एवं क्रूरता के एक्शन दृश्यों का मनोरंजक ढंग से प्रस्तुतिकरण किया गया, नायिका को भी सौम्यता से प्रस्तुत किया गया और संवाद भी अश्लील और फूहड़ नहीं थे. साथ ही साथ पुलिस की छवि और कार्यप्रणाली पर भी करारा प्रहार किया गया और अंत में यह सन्देश भी था की सिस्टम में रहते हुए भी बुराइयों का अंत  किया जा सकता है. फिल्मो का उद्देश्य होता है मनोरंजन के साथ समाज को एक सकारात्मक सन्देश भी दे लेकिन " डेली बेली " देखकर ऐसा लगता है की इस फिल्म ने सिर्फ उन लोगों के शब्द कोष में वृद्धि की है जिनके वाक्य की शुरुआत और अंत ही गालियों से होती है. हो सकता है की " डेली बेली " भविष्य में निर्मित होने वाली फिल्मो का आधारस्तंभ बन जाये जिनमे गालियों का प्रयोग आम हो जायेगा.

Saturday, July 30, 2011

SADI KA MAHA GAYAK ( KISHORE KUMAR)

सदी का महा गायक ................... किशोर कुमार...
किसी ने सही कहा था, किशोर कुमार जैसे गायक सदियों में एक बार ही जन्म लेते हैं. आज किशोर दा हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके नगमे दुनिया में आज भी उसी शिद्दत के साथ सुने जाते हैं. बिना किसी संगीत की विधिवत शिक्षा के उन्होंने गायकी को अपनाया और अपनी अनोखी आवाज़ से ५० और ६० के दशक के हताश युवा वर्ग में एक जोश और जूनून भर दिया. इस अश्व्घोशी आवाज़ के मालिक ने पूरे हिन्दुस्तान को अपनी आवाज़ का दीवाना बना दिया. जितने अच्छे वे अदाकार थे उतने ही महान वे गायक थे. उनकी यूडलिंग और गीत को सहजता से गाने की कला आज भी लोगों के दिलों को छूती है. शास्त्रीय संगीत हालाँकि उनकी शैली में शामिल नहीं था फिर भी शास्त्रीय धुनों पर आधारित गीतों को बखूबी निभाया जैसे महबूबा फिल्म का गीत " मेरे नैना सवानभादों "  ( राग शिवरंजनी ) आज भी लोगों के ज़हन में ताज़ा है, उनके रोमांटिक गीतों ने लोगों का दिल बहलाया, मस्ती भरे गीतों ने लोगों को खूब हंसाया और दर्द भरे गीतों ने लोगो रुलाया.
सन १९६९ की फिल्म "आराधना" का गीत " मेरे सपनो की रानी " किशोर दा की ज़िन्दगी का टर्निंग पॉइंट था यह समय था उस दशक  के उभरते संगीतकार आर. डी बर्मन का इन दोनों कलाकारों की जोड़ी ने ७० से लेकर ८० के दशक तक अनगिनत लोकप्रिय गीत दिए इन गीतों को हर उम्र के लोगों द्वारा पसंद किया गया. किशोर दा जब भी किसी गीत को गाते थे तो गाने से पहले उस गीत की हर बारीकी को समझते थे कि यह किस अभिनेता पर फिल्माया जा रहा है गीत की सिचुएशन क्या है, यह जान लेने के बाद वे अपनी आवाज़ में वे भाव पैदा करते थे जिससे कि गीत वास्तविक स्तिथि के अनुसार लगे, अभिनेता कि आवाज़ में अपनी आवाज़ को ढालने कि कला सिर्फ किशोर दा में ही थी. "हाफ टिकिट" फिल्म का गीत "आ के सीधी लगी जैसे दिल पे कटरिया" किशोर दा और प्राण साहब पर फिल्माया गया है इस गीत में किशोर दा ने खुद पर फिल्माया हुआ टुकड़ा लड़की कि आवाज़ में गाया है और प्राण साहब पर फिल्माया हुआ लड़के कि आवाज़ में. यह गीत सुनने के बाद प्राण साहब खुद बोले कि मुझे ऐसा लगा जैसे कि यह मेरी ही आवाज़ है. देव आनंद, संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, ऋषि कपूर ऐसे कई अभिनेता हैं जिनकी आवाज़ को किशोर दा ने बड़ी ख़ूबसूरती से निभाया. 
किशोर दा में अभिनय और गायकी के अलावा संगीत निर्देशन, गीतकार, निर्माता एवं निर्देशक की भी प्रतिभा थी. उनकी फिल्मे आज भी फिल्म इंडस्ट्री के इतिहास में अविस्मर्णीय है. अपने गाए लगभग २५०० से अधिक गीतों में सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों का रिकॉर्ड सिर्फ किशोर दा का ही है. अपने जीवन के संगीत सफ़र में किशोर दा ने सभी मूड के गीत गाए जिसमे ग़ज़लें भी शामिल हैं जैसे फिल्म "दर्द का रिश्ता" का गीत " यूँ नींद से वो जाने चमन जाग उठी है " ने यह साबित कर दिया था की वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे.
किशोर कुमार जैसी शकसियत को भुला पाना किसी भी सदी में संभव नहीं होगा, जो गीतों का खजाना उन्होंने इस दुनिया को दिया है वो कभी ख़त्म नहीं हो सकता. उनका असली नाम 'आभास कुमार गांगुली' था और उनके गीतों द्वारा उनके सभी चाहने वालों को उनका "आभास" हमेशा होता रहेगा. अपनी मृत्यु के पहले उन्होंने एक बार लीना जी को कहा था " देखना एक दिन लोग मुझे पुकारते रहेंगा और मै लौट कर नहीं आऊंगा ". लेकिन महागायक मरा नहीं करते उनकी आवाज़ सदियों तक लोगों के दिलों में सफ़र करती रहती है और कहती रहती है " राहों पे रहते हैं यादों में बसर करते हैं .....खुश रहो अहले वतन हम तो सफ़र करते हैं ".
 

Friday, May 20, 2011

POST 2

भाषा और हमारा व्यक्तित्व.... ( LANGUAGE AND OUR PERSONALITY )
भाषा क्या केवल "भाष" धातु से बना एक शब्द है या इससे अधिक कुछ और ?
वर्तमान परिपेक्ष्य में यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ज्वलंत विषय है | भाषा को केवल विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम भर समझा जाता है जबकि यह वह ज़रिया है जिसके द्वारा हम समूचे विश्व से रूबरू होते हैं |  तब क्या इस ज़रिये का पूर्ण रूप से शुद्ध और प्रभावी होना महत्वपूर्ण नहीं है ? ऐसा क्यों होता है यद्यपि बोलने का सामर्थ्य इश्वर प्रद्दत है और इसके लिए हमे कुछ विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता तथापि हम में से कुछ लोग ही ऐसे हैं जब वे बोलना प्रारंभ करते हैं तो शेष सभी उन्हें सुनने के लिए विवश हो जाते हैं | 
वस्तुतः प्रस्तुतीकरण ( PRESENTATION ) के इस दौर में भाषा हमारे व्यक्तित्व का आईना हो चली है बाह्य रूप से कोई व्यक्ति कितना ही आकर्षक हो परन्तु यह प्रभाव अधिक समय तक नहीं रह सकता यदि उसका भाषा पर विशेष अधिकार न हो | वहीँ सामान्य व्यक्तित्व  के साथ कोई भाषा का जादूगर गहरा प्रभाव छोड़ सकता है |
यहाँ उल्लेखनीय है कि आज की युवा पीढ़ी जब उच्च शिक्षा के बाद जीवन-चर्या ( CAREER ) के निर्णायक  मोड़ पर होती है तब उसे सिरे से नकार  दिया जाता है और उसे व्यक्तित्व विकास ( PERSONALITY DEVELOPMENT )  जैसे पाठ्यक्रमो के समक्ष शरणागत होना पड़ता है | मूल रूप से यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की दयनीय स्थिति का घोतक है जो बड़े पैमाने पर अन्धाधून्द गति से शिक्षा का ऐसा महल बनाने  में व्यस्त है, जिसकी भाषा रुपी नीव ही अत्यंत कमज़ोर है |
गौरतलब है जहाँ विदेशों में प्राथमिक कक्षाओं में भी बच्चों को शब्दकोष रखना अनिवार्य है, वहीँ हमारे विश्वविद्यालयीन छात्र भी शब्दकोष के महत्व से अनभिज्ञ हैं |
वैश्वीकरण ( GLOBALIZATION ) के इस युग में आवश्यक है कि हम न केवल प्रादेशिक भाषाओँ की राजनितिक लड़ाइयों से उबरें वरन हिंदी- अंग्रेजी के बचकाना विवादों से बचते हुए वृहद् स्तर पर परिपक्व मानसिकता से इस विषय पर निर्णायक विचार करें कि विश्व की कोई भी भाषा कम या अधिक महत्वपूर्ण नहीं है | महत्वपूर्ण है किसी भी भाषा का शुद्ध और सही प्रयोग और इस दिशा में किये गए सार्थक प्रयास |

POST 1

इच्छा, आवश्यकता और बाजारवाद ...................................
परम्पराओं और मूल्यों का परिवर्तन वर्त्तमान समय की एक ऐसी सच्चाई है जिसे नकारा जाना संभव नहीं है | बदलाव की इस आंधी में इच्छाओं और आवश्यकताओं के बीच का अंतर बहुत कम हो गया है | यदि आर्थिक मंदी जैसी वैश्विक समस्याओं का विश्लेषण किया जाये तब भी मूलतः यही निष्कर्ष निकलता है कि जब-जब चादर से अधिक पैर फ़ैलाने कि कोशिश की गई और मनुष्य इच्छाओं को आवश्यकता समझने का भ्रमजाल बुनता रहा तब-तब आर्थिक समस्याओं से दो-दो हाथ होता रहा | इसके लिए किसी हद तक बाजारवाद भी ज़िम्मेदार है जो एक आवश्यक वस्तुओं के इर्द गिर्द पचास अनावश्यक वस्तुओं को इस सलीके से प्रस्तुत करता है कि एक साधारण मनुष्य के लिए मोह संवरण कर पाना मुश्किल हो जाता है  और मॉल संस्कृति की इसी चकाचौंध से वशीभूत मानव दस आवश्यक वस्तुओं के साथ अनाश्यक वस्तुएं खरीद लाता है और जब उसकी जेब इस आर्थिक बोझ को वहन करने में असमर्थ हो जाती है तो धनार्जन के तमाम जायज़ तरीकों को ताक पर रख कर अधिक से अधिक धन कमाने कि ऐसी अंधी दौड़ में शामिल हो जाता है जो आर्थिक अपराधों कि जन्मदात्री है | 
आज के तकनीकी विकास ने बाज़ार को ऊँगली पकड़ कर घरों में दाखिल कर दिया है टेलिविज़न और इन्टरनेट से हम खुद को विश्वबाजार में खड़ा पाते हैं | यह सही है कि बाजारवाद को रोकना संभव नहीं है लेकिन मनुष्य अपनी इच्छाओं पर शत-प्रतिशत काबू पा सकता है | यदि वह ठान ले कि दो लोगों के घर में "फोर बर्नर" चूल्हे कि क्या आवश्यकता है ! एक सिम से काम चलता हो तो ड्युअल सिम फोन कि क्या ज़रूरत है ! यदि दफ्तर सौ कदम की दूरी पर हो तो कार की जगह साइकिल से काम चलाया जा सकता है ! परन्तु कार खरीदने  के पीछे सुविधा कम और स्टेटस अधिक दिखाई देता है | दरअसल यहाँ ज़रूरत उलटी गिनती की है .............. आर्थिक अपराधों के पीछे बाजारवाद .... बाजारवाद के पीछे हमारी अपनी इच्छाएँ ....  और इच्छाओं के पीछे डरी सहमी सी आवश्यकताएँ ...... और ज़रुरत है तो बस समझदारी से आवश्यकताओं पर रुक जाने की ठहर जाने की ................

Tuesday, April 12, 2011

R.D BURMAN OR RESEARCH AND DEVELOPEMENT BURMAN

आर. डी बर्मन या रिसर्च एंड डेवलपमेंट  बर्मन 
आर. डी बर्मन ने संगीत की दुनिया में जो आविष्कार और प्रयोग किये हैं वे किसी वैज्ञानिक द्वारा किये जा रहे अविष्कारों और प्रयोगों से कम नहीं है. सन ७० से लेकर ८० के दशक तक उन्होंने हिन्दुस्तानी संगीत को जो नया आयाम दिया उसे ही आज के दौर के संगीतकारों ने आधार बना कर संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बनाई है. शायद ही उस दौर का कोई स्थापित गायक या गायिका या फिर कोई नवोदित कलाकार रहा होगा जिसने आर.डी बर्मन के संगीत निर्देशन में गीत न गाये हों या गीत गाने का सपना न देखा हो. नए कलाकारों को जितना मौका आर.डी बर्मन ने दिया शायद ही उस दौर के किसी संगीतकर ने दिया होगा. शैलेन्द्र सिंह जो उस ज़माने के एक युवा और नवोदित गायक थे उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट पंचम हैं फिल्म "खेल खेल में का हमने तुमको देखा, ज़माने को दिखाना है का गीत होगा तुमसे प्यारा कौन और सागर का जाने दो ना "आज भी लोगों क जुबान पर हैं. शैलेन्द्र सिंह कहते हैं पंचम ने कभी भी किसी गायक पर संगीत को लेकर दबाव नहीं बनाया गायक की आवाज़ और उसकी क्षमता के अनुसार वे अपने संगीत में परिवर्तन कर लेते थे.
आशा जी की आवाज़ को एक वाद्य यन्त्र की तरह उपयोग में लाना आर.डी बर्मन के लिए ही संभव था. लता जी, किशोर दा, रफ़ी साहब, मुकेश जी, मन्ना डे जैसे महान कलाकारों द्वारा पंचम के संगीत निर्देशन में गाये गीत अविस्मर्णीय हैं. 
आर.डी बर्मन ने प्रकृति में मौजूद हर वस्तु में संगीत ढूँढने की कोशिश करी और अपने संगीत में उसे प्रयोग में लाकर सफलता भी प्राप्त करी.......................... आज उस महान वैज्ञानिक का जन्म दिन है. पंचम उनके चाहने वालों के दिलों में हमेशा रहेंगे, और उनके द्वारा किये गए रिसर्च एंड डेवलपमेंट आज के संगीतकारों और युवा पीढ़ी को प्रेरणा देते रहेंगे.